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পিতৃ পক্ষে শ্রাদ্ধ কখন করবেন: তিথি অনুযায়ী সঠিক দিন চেনার সহজ পদ্ধতি

आचार्या सुनीता जोशी·2 November 2026· 5 মিনিট
पितृ पक्ष में श्राद्ध कब करें: तिथि से सही दिन पहचानने की आसान विधि

पितृ पक्ष में अपने दिवंगत पूर्वजों का श्राद्ध सही दिन पर करना अक्सर सबसे बड़ी उलझन बन जाता है। पिता की मृत्यु किस तिथि को हुई थी, वह तिथि इस साल पंचांग में कब पड़ रही है, और अगर वह तिथि किसी कारण से लुप्त हो जाए तो क्या करें, ये सवाल हर परिवार के सामने आते हैं। इस लेख में हम पितृ पक्ष श्राद्ध तिथि कैसे पता करें, यह व्यावहारिक तरीके से समझेंगे, ताकि आप बिना घबराए सही दिन चुन सकें।

पितृ पक्ष श्राद्ध तिथि कैसे पता करें: सबसे पहले मूल बात समझें

श्राद्ध का मूल नियम सीधा है: जिस व्यक्ति का श्राद्ध करना है, उसकी मृत्यु जिस हिंदू तिथि (चंद्र तिथि) को हुई थी, पितृ पक्ष में उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। ध्यान रखें कि यह अंग्रेज़ी तारीख से नहीं चलता। हमारी तिथियाँ चंद्रमा की गति पर आधारित होती हैं, इसलिए हर साल उनकी ग्रेगोरियन तारीख बदल जाती है। यही कारण है कि कई लोग पिछले साल की तारीख देखकर गलती कर बैठते हैं।

आपको तीन चीज़ें चाहिए: मृत्यु की हिंदी पंचांग तिथि (पक्ष सहित, यानी शुक्ल या कृष्ण), उस व्यक्ति की मृत्यु का वर्ष या कम से कम अनुमानित वर्ष, और इस वर्ष का पितृ पक्ष पंचांग। अगर परिवार के बुज़ुर्गों को ठीक-ठीक तिथि याद नहीं, तो घर के पुराने श्राद्ध रजिस्टर, गंगाजल या गयाजी के पुरोहित के बही-खाते, या पुराने पंचांग की पंक्तियाँ देखें। कई परिवार मृत्यु-तिथि पर प्रयोग होने वाला वही मंत्र-पत्र या पूजन सामग्री की सूची भी संभालते थे, जिससे तिथि का सुराग मिल जाता है।

मृत्यु-तिथि कैसे पहचानें: पंचांग में चरण-दर-चरण

मान लीजिए आपके दादाजी की मृत्यु "आश्विन कृष्ण सप्तमी" को हुई थी। अब इस वर्ष के पंचांग में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी देखिए। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि पितृ पक्ष आम तौर पर भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक चलता है, लेकिन चंद्र मास के नाम प्रदेश और पंचांग परंपरा के हिसाब से थोड़े भिन्न हो सकते हैं। इसलिए पंचांग में लिखे पक्ष और मास के नाम को पहले मिलाइए।

  1. सबसे पहले मृत्यु-मास और पक्ष सुनिश्चित करें (जैसे चैत्र शुक्ल, आश्विन कृष्ण)।
  2. फिर उस मास के पृष्ठ पर तिथि-क्रम खोलें और वह तिथि ढूँढें (प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया… अमावस्या या पूर्णिमा)।
  3. इस वर्ष पितृ पक्ष में वह तिथि किस ग्रेगोरियन दिन पर पड़ रही है, यह नोट करें।
  4. अगर परिवार में कई पूर्वजों की एक ही तिथि है, तो उन सबका श्राद्ध उसी दिन एक साथ किया जा सकता है, बशर्ते विधि और परंपरा अनुमति दे।

एक व्यावहारिक सुझाव: पंचांग में तिथि के आरंभ और समाप्ति का समय भी होता है। अगर मृत्यु रात में हुई थी और तिथि सूर्योदय के बाद बदल गई, तो परंपरा के अनुसार उस दिन की "उदय तिथि" को मान्य माना जाता है, यानी जो तिथि सूर्योदय के समय चल रही हो। यह नियम आमतौर पर श्राद्ध पर लागू होता है, लेकिन स्थानीय पुरोहित से पुष्टि कर लेना सबसे अच्छा है।

उदाहरण: एक वास्तविक परिवार की उलझन

सोचिए कि एक परिवार के पिता की मृत्यु "भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी" को हुई थी। इस वर्ष पितृ पक्ष में त्रयोदशी ग्रेगोरियन कैलेंडर के एक ऐसे दिन पड़ी कि वही दिन उनकी सुविधा से बाहर था। ऐसे में परिवार ने तिथि नहीं बदली, बल्कि पंचांग से उसी त्रयोदशी की पंक्ति निकालकर छुट्टी का प्लान बनाया। याद रखें, तिथि नियम तय करती है, कैलेंडर की सुविधा नहीं।

जब तिथि लुप्त हो जाए: क्या करें?

यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल है। कभी-कभी किसी चंद्र तिथि का पूरा अंश एक सौर दिन के भीतर आ ही नहीं पाता, और पंचांग उसे "लुप्त" या "क्षय" दिखाता है। ऐसी स्थिति में शास्त्र ने कुछ व्यावहारिक विकल्प बताए हैं।

  • पूर्ववर्ती दिन चुनें: अधिकतर परंपराएँ कहती हैं कि लुप्त तिथि पर श्राद्ध उसी के पास के पिछले दिन किया जाए।
  • सर्वपितृ अमावस्या का आश्रय: जिनकी मृत्यु-तिथि ज्ञात नहीं, या जो तिथि लुप्त हो गई हो, उनके लिए पितृ पक्ष की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) को श्राद्ध का सामान्य दिन माना जाता है।
  • पुरोहित से परामर्श: स्थानीय परंपरा अलग हो सकती है, इसलिए अंतिम निर्णय विश्वसनीय पुरोहित या अपने कुल की रीति से लें।

जब दो तिथियाँ पड़ें: दोहरी स्थिति कैसे संभालें

कभी-कभी एक ही सौर दिन में दो चंद्र तिथियाँ आ जाती हैं, या एक तिथि दो दिनों में फैल जाती है। यहाँ घबराने की ज़रूरत नहीं। आमतौर पर श्राद्ध उस तिथि पर किया जाता है जो उस दिन के मुख्य भाग (अपराह्न, यानी दोपहर के बाद का समय, जब श्राद्ध कर्म का विधान है) में चल रही हो। पंचांग में इन दोनों तिथियों के समय देखें और जिस तिथि का अंश अपराह्न में अधिक हो, उसी को प्राथमिकता दें।

दोहरी तिथि की चेकलिस्ट

  • दोनों तिथियों के आरंभ और समाप्ति समय नोट करें।
  • देखें कि अपराह्न के समय कौन-सी तिथि चल रही है।
  • मृत्यु की तिथि से मिलान करें, न कि सिर्फ़ तारीख से।
  • अगर संदेह बना रहे, तो उसी दिन दोनों में से पहले वाली तिथि पर पूजा करके दूसरे दिन संक्षिप्त तर्पण का नियम कुछ परिवार मानते हैं। यह कुल-परंपरा पर निर्भर है।

श्राद्ध के दिन की तैयारी: एक त्वरित चेकलिस्ट

तिथि तय हो जाए तो तैयारी आसान हो जाती है। इस चेकलिस्ट को प्रिंट करके रख सकते हैं:

  • मृत्यु-तिथि, पक्ष और मास लिखा हुआ कागज़ पास रखें।
  • इस वर्ष की ग्रेगोरियन तारीख और दिन पक्का करें।
  • पुरोहित या पंडित जी से समय और विधि की पुष्टि करें।
  • तर्पण सामग्री (तिल, जल, कुश, पिंड सामग्री) समय से जुटाएँ।
  • परिवार के सदस्यों को पहले से सूचित करें ताकि सब उपस्थित रहें।

पितृ पक्ष में श्राद्ध का मुहूर्त और ग्रह-नक्षत्र का महत्व

श्राद्ध मुख्यतः तिथि पर आधारित कर्म है, इसलिए उसके लिए विशेष मुहूर्त खोजने की ज़रूरत कम होती है। फिर भी कई परिवार चाहते हैं कि दिन का चुनाव शुभ ग्रह-स्थिति में हो। पितृ कर्म के लिए अपराह्न का समय और कुतप काल (दिन का आठवाँ मुहूर्त, लगभग मध्याह्न के बाद का समय) शास्त्र में महत्वपूर्ण माना गया है। नक्षत्र और ग्रह दशा का विचार भी कुछ लोग अपनी कुंडली के अनुसार करते हैं। अगर आप अपनी कुंडली में पितृ दोष या पूर्वजों से संबंधित योगों को लेकर चिंतित हैं, तो अपनी कुंडली के आधार पर मार्गदर्शन लेना उपयोगी हो सकता है।

पितृ पक्ष श्राद्ध तिथि कैसे पता करें: बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न

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