Ramagya

ध्रुव तारा

विष्णु

राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं — सुनीति और सुरुचि। सुनीति का बेटा ध्रुव था और सुरुचि का बेटा उत्तम। राजा सुरुचि को ज़्यादा प्यार करते थे। एक दिन छोटा ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठना चाहता था। सुरुचि ने उसे धक्का देकर कहा कि तुम्हें राजा की गोद में बैठने का कोई अधिकार नहीं है। अगर बैठना है तो भगवान से प्रार्थना करो कि अगले जन्म में मेरे पेट से पैदा हो। पाँच साल का ध्रुव बहुत दुखी हुआ। वह रोता हुआ अपनी माँ सुनीति के पास गया। सुनीति ने कहा कि बेटा, भगवान विष्णु ही सबसे बड़े हैं, उनकी शरण में जाओ। ध्रुव ने निश्चय किया कि वह भगवान विष्णु की तपस्या करेगा। इतना छोटा बालक जंगल में गया और कठोर तपस्या शुरू की। उसने खाना-पीना छोड़ दिया। देवर्षि नारद ने उसे विष्णु मंत्र दिया। ध्रुव की तपस्या इतनी कठोर थी कि तीनों लोक काँपने लगे। भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और ध्रुव के सामने प्रकट हुए। उन्होंने ध्रुव को आशीर्वाद दिया और उसे आकाश में एक स्थायी तारे का स्थान दिया जो कभी नहीं हिलता। यही ध्रुव तारा है जो आज भी उत्तर दिशा में चमकता है।

सीख

दृढ़ संकल्प और लगन से कोई भी असंभव काम संभव हो सकता है।