द्रौपदी का चीरहरण
कृष्ण
महाभारत की सबसे दुखद घटनाओं में से एक द्रौपदी का चीरहरण है। कौरवों ने छल से पांडवों को जुए में हराया। दुर्योधन ने शकुनि की मदद से युधिष्ठिर को जुए की लत में फँसाया। युधिष्ठिर ने अपना राज्य, धन, भाई और अंत में द्रौपदी को भी दाँव पर लगा दिया और हार गए। दुर्योधन ने दुःशासन को आदेश दिया कि द्रौपदी को भरी सभा में घसीटकर लाओ। दुःशासन ने द्रौपदी के बाल पकड़कर उन्हें सभा में खींचा। दुर्योधन ने दुःशासन को द्रौपदी का चीर हरण करने का आदेश दिया। द्रौपदी ने सभा में उपस्थित सभी बड़ों से न्याय की गुहार लगाई, परंतु भीष्म, द्रोण और विदुर सब मौन रहे। जब कोई सहायता नहीं मिली तो द्रौपदी ने दोनों हाथ जोड़कर भगवान कृष्ण को पुकारा। कृष्ण ने दूर द्वारका से ही अपनी माया से द्रौपदी की रक्षा की। दुःशासन वस्त्र खींचता रहा लेकिन वस्त्र कभी समाप्त नहीं हुआ। अंततः दुःशासन थककर गिर पड़ा। द्रौपदी ने प्रतिज्ञा ली कि जब तक दुःशासन के रक्त से उसके बाल नहीं धोए जाएँगे, वह बाल नहीं बाँधेगी। इस अपमान ने महाभारत के महायुद्ध की नींव रखी।
सीख
अन्याय के समय चुप रहना भी अन्याय में भागीदारी है।