एकलव्य
एकलव्य
एकलव्य एक आदिवासी लड़का था जो धनुर्विद्या सीखना चाहता था। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास गया और उनसे शिष्य बनाने की प्रार्थना की। लेकिन द्रोणाचार्य ने मना कर दिया क्योंकि वे केवल राजकुमारों को पढ़ाते थे। एकलव्य निराश नहीं हुआ। उसने जंगल में जाकर गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति बनाई। हर रोज़ वह उस मूर्ति के सामने बैठकर अभ्यास करता। उसने मूर्ति को अपना गुरु मानकर अकेले ही धनुर्विद्या सीखी। दिन-रात कठोर परिश्रम से एकलव्य एक महान धनुर्धर बन गया। एक दिन जंगल में एक कुत्ता भौंक रहा था। एकलव्य ने इतनी तेज़ी और सटीकता से तीर चलाए कि कुत्ते का मुँह तीरों से भर गया लेकिन उसे कोई चोट नहीं लगी। जब द्रोणाचार्य ने यह देखा तो वे हैरान रह गए। उन्होंने पूछा कि तुम्हारा गुरु कौन है। एकलव्य ने कहा कि आप ही मेरे गुरु हैं और मूर्ति दिखाई। द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य का दाहिना अँगूठा माँग लिया। एकलव्य ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना अँगूठा काटकर गुरु को दे दिया। यह त्याग और गुरु भक्ति की अनोखी मिसाल है।
सीख
सच्ची लगन और समर्पण से कोई भी विद्या सीखी जा सकती है।