Ramagya
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सुदामा और कृष्ण

कृष्ण

सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे जो बचपन में कृष्ण के सहपाठी और प्रिय मित्र थे। बड़े होकर कृष्ण द्वारका के राजा बने और सुदामा गरीबी में जीवन बिताने लगे। उनके बच्चों को खाने को भी नहीं मिलता था। सुदामा की पत्नी ने कहा कि अपने मित्र कृष्ण से मिलो, शायद वे कुछ सहायता करें। सुदामा कृष्ण के लिए उपहार में कुछ चावल की पोटली बाँधकर द्वारका गए। जब कृष्ण ने सुदामा को देखा तो वे दौड़कर आए और गले लगा लिया। कृष्ण ने स्वयं सुदामा के पैर धोए और उन्हें अपने सिंहासन पर बिठाया। सुदामा को अपने मामूली उपहार देने में शर्म आ रही थी, लेकिन कृष्ण ने स्वयं पोटली छीनकर चावल खाए और बोले कि इससे स्वादिष्ट कुछ नहीं। सुदामा कृष्ण से कुछ माँग नहीं पाए और खाली हाथ लौट पड़े। लेकिन जब वे अपने गाँव पहुँचे तो देखा कि उनकी झोपड़ी की जगह एक भव्य महल खड़ा था। उनका परिवार सुंदर वस्त्रों में था और घर अन्न-धन से भरा था। कृष्ण ने बिना कहे ही अपने मित्र की सारी गरीबी दूर कर दी थी।

सीख

सच्ची मित्रता में अमीरी-गरीबी का कोई भेद नहीं होता।