विभीषण की शरणागति
राम
विभीषण रावण का छोटा भाई था, परंतु वह धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वाला था। जब रावण ने सीता का अपहरण किया, तो विभीषण ने अपने भाई को बार-बार समझाया कि यह अधर्म है और सीता को सम्मानपूर्वक लौटा देना चाहिए। उन्होंने कहा कि राम से शत्रुता लंका के विनाश का कारण बनेगी। रावण ने विभीषण की बात नहीं मानी और उन्हें अपमानित करके लंका से निकाल दिया। विभीषण ने कठिन निर्णय लिया — उन्होंने अपना राज्य, परिवार और सुख-सुविधाएँ छोड़कर धर्म का साथ देने का फैसला किया। वे समुद्र पार करके राम की शरण में आए। वानर सेना में कई लोगों ने विभीषण पर संदेह किया। सुग्रीव ने कहा कि शत्रु के भाई पर विश्वास नहीं करना चाहिए। परंतु राम ने कहा कि जो कोई भी शरण में आता है, उसे स्वीकार करना धर्म है। राम ने विभीषण को गले लगाया और उन्हें लंका का भावी राजा घोषित किया। विभीषण ने राम को रावण की सेना के रहस्य बताए जो युद्ध जीतने में सहायक हुए। यह कथा बताती है कि सत्य का साथ देने के लिए कभी-कभी अपनों को भी छोड़ना पड़ता है।
सीख
धर्म का साथ देना सबसे बड़ी वीरता है, भले ही इसके लिए अपनों को छोड़ना पड़े।