युधिष्ठिर का कुत्ता
युधिष्ठिर
महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने राज्य त्याग दिया और स्वर्ग की यात्रा पर निकले। पाँचों पांडव और द्रौपदी हिमालय की ओर चल पड़े। रास्ते में एक कुत्ता भी उनके साथ हो लिया। यात्रा बहुत कठिन थी। एक-एक करके द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीम गिरते गए और स्वर्ग नहीं पहुँच सके। अंत में केवल युधिष्ठिर और वह कुत्ता बचे। वे स्वर्ग के द्वार तक पहुँचे। देवराज इंद्र ने अपना रथ भेजा और युधिष्ठिर को स्वर्ग में आने का निमंत्रण दिया। परंतु इंद्र ने कहा कि कुत्ते को स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिल सकता। युधिष्ठिर ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यह कुत्ता पूरी यात्रा में मेरे साथ रहा, मैं इसे छोड़कर स्वर्ग नहीं जाऊँगा। जो अपने विश्वासपात्र साथी को छोड़ दे, उसे स्वर्ग का अधिकार नहीं। तभी वह कुत्ता अपने असली रूप में प्रकट हुआ — वह साक्षात धर्मराज यमदेव थे। यह युधिष्ठिर की अंतिम परीक्षा थी। धर्मराज ने प्रसन्न होकर युधिष्ठिर को सशरीर स्वर्ग में प्रवेश दिया।
सीख
वफादारी और करुणा सबसे बड़े गुण हैं — कभी अपने साथी को मत छोड़ो।