Ramagya

अहोई अष्टमी व्रत कथा

अहोई माता · कार्तिक

कथा

प्राचीन काल में एक साहूकार था जिसके सात बेटे और सात बहुएँ थीं। दीपावली से पहले सभी बहुएँ जंगल से मिट्टी लाने गईं ताकि घर की लिपाई-पुताई कर सकें। बड़ी बहू जहाँ मिट्टी खोद रही थी वहाँ एक साही (स्याहू) का बिल था। मिट्टी खोदते समय उसकी खुरपी से साही का एक बच्चा घायल हो गया और मर गया। साही माता ने क्रोधित होकर श्राप दिया कि जिसने मेरे बच्चे को मारा है उसकी कोख बंद हो जाएगी। बड़ी बहू ने डरकर अपनी छोटी बहू पर दोष लगा दिया। इसके बाद छोटी बहू के बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। सात बार ऐसा हुआ और वह बहुत दुखी हुई। छोटी बहू ने एक बुजुर्ग महिला से सलाह ली। उन्होंने बताया कि अहोई अष्टमी के दिन साही माता की पूजा करो और सच्चे मन से क्षमा माँगो। छोटी बहू ने विधिपूर्वक अहोई माता का व्रत किया और साही माता से क्षमा याचना की। उसकी सच्ची भक्ति देखकर साही माता प्रसन्न हुईं और उन्होंने श्राप वापस ले लिया। इसके बाद छोटी बहू को सात स्वस्थ पुत्र हुए। तभी से माताएँ अपनी संतान की रक्षा और कल्याण के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं।

पूजा विधि

कार्तिक कृष्ण अष्टमी को व्रत रखें। दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाएँ। सायंकाल तारे दिखने पर अहोई माता की पूजा करें और कथा सुनें। पूजा के बाद व्रत खोलें।

महत्व

अहोई अष्टमी का व्रत माताओं द्वारा अपनी संतान की लम्बी आयु, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए रखा जाता है। यह मातृत्व के प्रेम और बलिदान का प्रतीक है।