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दशा माता व्रत कथा

दशा माता · चैत्र

कथा

एक राजा और रानी बहुत सुखी जीवन व्यतीत कर रहे थे। रानी प्रतिवर्ष दशा माता का व्रत रखती थी और दशा का डोरा गले में पहनती थी। एक दिन राजा ने पूछा कि यह डोरा क्या है। रानी ने बताया कि यह दशा माता का डोरा है जो सुख-समृद्धि देता है। राजा ने अहंकार में कहा कि हमारी समृद्धि हमारे भाग्य से है, किसी डोरे से नहीं। राजा ने क्रोध में डोरा तुड़वाकर फेंक दिया। दशा माता रुष्ट हो गईं। धीरे-धीरे राजा का सब कुछ नष्ट होने लगा। राज्य छिन गया, धन समाप्त हो गया और वे दोनों जंगल में भटकने लगे। रानी बहुत दुखी हुई लेकिन उसने दशा माता में अपनी आस्था नहीं छोड़ी। एक दिन रानी को जंगल में गाय के गोबर पर दशा माता का डोरा मिला। उसने उसे उठाकर धोया और श्रद्धापूर्वक गले में बाँध लिया। उसी दिन से उनकी दशा बदलने लगी। राजा को खोया हुआ राज्य वापस मिला, धन-सम्पत्ति लौट आई और सुख-शांति फिर से स्थापित हुई। राजा ने अपनी गलती स्वीकार की और तब से दोनों ने प्रतिवर्ष दशा माता का व्रत पूर्ण श्रद्धा से किया।

पूजा विधि

चैत्र मास की दशमी को व्रत रखें। दस गाँठों वाला डोरा बनाकर दशा माता की पूजा करें। कथा सुनें और डोरा गले में बाँधें। दस प्रकार के अनाज का भोग लगाएँ।

महत्व

दशा माता का व्रत जीवन की दशा (स्थिति) को सुधारने और सुख-समृद्धि प्राप्त करने के लिए रखा जाता है। यह विश्वास और श्रद्धा की शक्ति का प्रतीक है।

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