गणेश चतुर्थी व्रत कथा
गणेश · भाद्रपद
कथा
एक समय भगवान शिव और पार्वती कैलाश पर्वत पर विराजमान थे। पार्वती जी स्नान करने जा रही थीं तो उन्होंने अपने शरीर के मैल से एक बालक बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने उसे द्वार पर पहरा देने को कहा। जब शिव जी आए तो बालक ने उन्हें रोका। क्रोधित शिव ने उसका सिर काट दिया। पार्वती के विलाप पर शिव ने हाथी का सिर लगाकर बालक को पुनर्जीवित किया और उसे गणेश नाम दिया। शिव जी ने गणेश को वरदान दिया कि किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले उनकी पूजा होगी। सभी देवताओं ने गणेश को आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा जी ने कहा कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को जो गणेश की पूजा करेगा उसके सभी विघ्न दूर होंगे। एक बार चन्द्रमा ने गणेश जी के स्वरूप का उपहास किया। गणेश जी ने क्रोधित होकर श्राप दिया कि चतुर्थी को जो चन्द्रमा देखेगा उस पर मिथ्या आरोप लगेगा। इसीलिए गणेश चतुर्थी को चन्द्रमा नहीं देखते। इस दिन गणेश जी की मूर्ति स्थापित कर पूजा करते हैं और दस दिन बाद विसर्जन करते हैं। गणेश जी विघ्नहर्ता हैं और बुद्धि के देवता हैं।
पूजा विधि
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें। मोदक, लड्डू और दूर्वा घास अर्पित करें। गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। दस दिन पूजा के बाद विसर्जन करें। इस दिन चन्द्रमा न देखें।
महत्व
गणेश चतुर्थी विघ्नहर्ता गणेश जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। यह बुद्धि, समृद्धि और शुभ आरम्भ का पर्व है।