Ramagya
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हरतालिका तीज व्रत कथा

शिव-पार्वती · भाद्रपद

कथा

देवी पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्होंने बालू से शिवलिंग बनाकर जंगल में घोर तप किया। न अन्न खाया, न जल पिया। वर्षों तक केवल सूखे पत्ते खाकर तपस्या करती रहीं और अंत में वह भी त्याग दिया। पार्वती के पिता हिमालय राज ने उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया। जब पार्वती को यह पता चला तो वे बहुत दुखी हुईं क्योंकि उनका मन तो केवल शिव में था। पार्वती की सखी ने उन्हें हर ले जाकर (हरतालिका) एक गुफा में छिपा दिया ताकि यह विवाह न हो सके। वहाँ पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया को रेत का शिवलिंग बनाकर रात भर जागकर पूजा की। भगवान शिव पार्वती की भक्ति से प्रसन्न हुए और उनके समक्ष प्रकट हुए। शिव ने पार्वती को वरदान दिया कि वे उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करते हैं। जब हिमालय राज को शिव जी की इच्छा का पता चला तो उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक पार्वती का विवाह शिव जी से कर दिया। तभी से सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए और कुँवारी कन्याएँ अच्छे वर की प्राप्ति के लिए हरतालिका तीज का व्रत रखती हैं।

पूजा विधि

भाद्रपद शुक्ल तृतीया को निर्जला व्रत रखें। बालू या मिट्टी से शिव-पार्वती की मूर्ति बनाकर पूजा करें। रात भर जागकर भजन-कीर्तन करें। अगले दिन प्रातः पूजा के बाद व्रत खोलें।

महत्व

हरतालिका तीज का व्रत पार्वती जी की अटूट भक्ति और प्रेम का प्रतीक है। यह सुहागिन स्त्रियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है।