Ramagya
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प्रदोष व्रत कथा

भगवान शिव · प्रत्येक त्रयोदशी

कथा

समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र मथा तो उसमें से अनेक रत्न निकले। सबसे पहले भयंकर हालाहल विष निकला जिसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। सभी देवता भयभीत होकर भगवान शिव की शरण में गए। शिव जी ने सबकी रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। यह घटना त्रयोदशी तिथि को प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में हुई थी। शिव जी के इस त्याग से प्रसन्न होकर सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की। ब्रह्मा जी ने कहा कि जो मनुष्य त्रयोदशी को प्रदोष काल में शिव जी की पूजा करेगा उसे सभी पापों से मुक्ति मिलेगी और शिव जी की विशेष कृपा प्राप्त होगी। एक निर्धन ब्राह्मण ने प्रदोष व्रत रखा और शिव जी की पूजा की। शिव जी ने प्रसन्न होकर उसे धन, यश और मोक्ष का वरदान दिया। तभी से प्रत्येक मास की दोनों त्रयोदशियों को प्रदोष व्रत रखा जाता है। सोमवार को पड़ने वाला प्रदोष सोम प्रदोष और शनिवार को पड़ने वाला शनि प्रदोष विशेष फलदायी माना जाता है।

पूजा विधि

त्रयोदशी तिथि को व्रत रखें। प्रदोष काल (सूर्यास्त से डेढ़ घंटे बाद तक) में शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाएँ। शिव परिवार की पूजा करें। ॐ नमः शिवाय का जाप करें। कथा सुनकर व्रत खोलें।

महत्व

प्रदोष व्रत भगवान शिव के विष पान के त्याग की स्मृति में रखा जाता है। यह पापों के नाश, कष्ट निवारण और शिव कृपा प्राप्ति का सर्वोत्तम व्रत है।