ऋषि पंचमी व्रत कथा
सप्तऋषि · भाद्रपद
कथा
विदर्भ देश में एक ब्राह्मण रहता था जिसका नाम उत्तंक था। उसकी पत्नी सुशीला बहुत धर्मपरायण थी। उनकी एक पुत्री थी जिसका विवाह एक योग्य ब्राह्मण से हुआ। दुर्भाग्य से विवाह के कुछ समय बाद ही उसके पति की मृत्यु हो गई। पुत्री के शरीर पर कीड़े पड़ने लगे और वह बहुत कष्ट में थी। उत्तंक ने महर्षियों से इसका कारण पूछा। ऋषियों ने बताया कि पूर्व जन्म में उसकी पुत्री ने रजस्वला होने पर भी रसोई के बर्तन छू लिए थे जिससे यह पाप लगा। ऋषियों ने उपाय बताया कि भाद्रपद शुक्ल पंचमी को सप्तऋषियों की पूजा करे और ऋषि पंचमी का व्रत रखे तो इस पाप से मुक्ति मिलेगी। पुत्री ने पूर्ण श्रद्धा से ऋषि पंचमी का व्रत किया। उसने सप्तऋषियों — कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ — की विधिवत पूजा की। व्रत के प्रभाव से उसके सारे कष्ट दूर हो गए, शरीर स्वस्थ हो गया और उसे पूर्व जन्म के पाप से मुक्ति मिली। तभी से ऋषि पंचमी का व्रत पापों के प्रायश्चित और शुद्धि के लिए रखा जाता है।
पूजा विधि
भाद्रपद शुक्ल पंचमी को व्रत रखें। सप्तऋषियों की मूर्ति या चित्र स्थापित कर पूजा करें। दातुन से दाँत साफ करें। हल से जोती गई फसल न खाएँ, केवल फल और कंदमूल खाएँ।
महत्व
ऋषि पंचमी का व्रत पापों के प्रायश्चित और आत्मशुद्धि के लिए रखा जाता है। यह सप्तऋषियों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है।