Ramagya
🙏

संतोषी माता व्रत कथा

संतोषी माता · प्रत्येक शुक्रवार

कथा

एक बुढ़िया के सात बेटे और उनकी बहुएँ थीं। सबसे छोटे बेटे की पत्नी बहुत गरीब थी लेकिन भगवान में उसकी गहरी आस्था थी। एक दिन उसने कुछ स्त्रियों को संतोषी माता का व्रत करते देखा और उनसे व्रत की विधि पूछी। उन्होंने बताया कि सोलह शुक्रवार तक व्रत रखने और गुड़-चने का प्रसाद चढ़ाने से माता प्रसन्न होती हैं। छोटी बहू ने श्रद्धापूर्वक व्रत रखना शुरू किया। हर शुक्रवार वह गुड़-चने का भोग लगाती और कथा सुनती। संतोषी माता उसकी भक्ति से प्रसन्न हुईं। धीरे-धीरे उसके घर में सुख-समृद्धि आने लगी। उसके पति को अच्छा काम मिला और घर में धन-धान्य की कमी नहीं रही। परन्तु जब बड़ी बहुओं ने छोटी बहू की बढ़ती समृद्धि देखी तो उन्हें ईर्ष्या हुई। उन्होंने उद्यापन के दिन भोजन में खटाई मिला दी जो माता को अप्रिय है। इससे संतोषी माता क्रोधित हुईं और छोटी बहू पर विपत्तियाँ आने लगीं। छोटी बहू ने फिर से सच्चे मन से व्रत किया और माता से क्षमा माँगी। माता ने प्रसन्न होकर उसके सारे कष्ट दूर किए और उसे सदा सुखी रहने का आशीर्वाद दिया। बड़ी बहुओं ने भी अपनी गलती मानी और सभी ने मिलकर माता की पूजा की।

पूजा विधि

सोलह शुक्रवार तक व्रत रखें। गुड़ और भुने चने का प्रसाद बनाएँ। संतोषी माता की कथा सुनें। व्रत में खट्टा भोजन वर्जित है। सोलहवें शुक्रवार को उद्यापन करें और आठ लड़कों को भोजन कराएँ।

महत्व

संतोषी माता का व्रत संतोष और सुख-समृद्धि प्रदान करता है। यह व्रत विशेषकर स्त्रियों द्वारा परिवार की खुशहाली और मनोकामना पूर्ति के लिए रखा जाता है।