शनिवार व्रत कथा
शनि देव · प्रत्येक शनिवार
कथा
एक बार सभी ग्रहों में बहस हुई कि सबसे बड़ा कौन है। यह विवाद देवराज इन्द्र के पास पहुँचा। इन्द्र ने कहा कि पृथ्वी पर जाकर किसी विद्वान राजा से पूछो। सभी ग्रह राजा विक्रमादित्य के दरबार में पहुँचे। राजा ने बुद्धिमानी से सभी ग्रहों के लिए अलग-अलग धातु के सिंहासन बनवाए। सोने का सूर्य के लिए, चाँदी का चन्द्र के लिए और लोहे का शनि देव के लिए। शनि देव ने समझा कि राजा ने उन्हें सबसे नीचा दिखाया है। उन्होंने क्रोधित होकर राजा पर साढ़ेसाती की दशा लगा दी। राजा विक्रमादित्य पर भयंकर कष्ट आए। राज्य छिन गया, अपमानित हुए, हाथ-पैर कटवाए गए और एक तेली के यहाँ नौकर बनना पड़ा। परन्तु राजा ने धैर्य नहीं खोया। एक रात राजा ने एक राग गाया जो इतना मधुर था कि नगर की राजकुमारी मोहित हो गई। धीरे-धीरे सत्य सामने आया और राजा की पहचान हुई। शनि देव ने देखा कि राजा ने सारे कष्ट सहे पर विचलित नहीं हुआ। शनि देव प्रसन्न हुए और साढ़ेसाती समाप्त हुई। राजा को उसका राज्य वापस मिला। तभी से लोग शनिवार का व्रत रखकर शनि देव को प्रसन्न करते हैं।
पूजा विधि
शनिवार को व्रत रखें। शनि देव को सरसों का तेल, काले तिल, काले उड़द और लोहे की वस्तु अर्पित करें। पीपल के पेड़ पर सरसों का तेल चढ़ाएँ। शनि चालीसा का पाठ करें। काले या नीले वस्त्र पहनें।
महत्व
शनिवार का व्रत शनि देव की कृपा प्राप्त करने और साढ़ेसाती व ढैय्या के कष्टों को कम करने के लिए रखा जाता है।