शीतला माता व्रत कथा
शीतला माता · चैत्र
कथा
प्राचीन काल में एक नगर में दो पड़ोसन रहती थीं। एक शीतला माता की भक्त थी और दूसरी नहीं मानती थी। शीतला सप्तमी के दिन भक्त पड़ोसन ने एक दिन पहले ही भोजन बना लिया क्योंकि इस दिन चूल्हा नहीं जलाते। उसने बासी भोजन (बसौड़ा) खाया और माता की पूजा की। दूसरी पड़ोसन ने उसका मजाक उड़ाया और कहा कि बासी खाना खाने से क्या होगा। उसने ताजा भोजन बनाया और चूल्हा जलाया। शीतला माता क्रोधित हुईं। जो पड़ोसन माता को नहीं मानती थी उसके परिवार में सभी को चेचक और ज्वर हो गया। बच्चे बीमार पड़ गए और घर में हाहाकार मच गया। जब उसने देखा कि भक्त पड़ोसन का परिवार स्वस्थ और सुखी है तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने शीतला माता से क्षमा माँगी और व्रत रखने का संकल्प लिया। माता ने प्रसन्न होकर उसके परिवार को रोगमुक्त कर दिया। तभी से लोग शीतला माता का व्रत रखते हैं और बासी भोजन खाते हैं। माता शीतलता प्रदान करती हैं और रोगों से रक्षा करती हैं।
पूजा विधि
होली के बाद पहले सोमवार या गुरुवार को व्रत रखें। एक दिन पहले भोजन बनाकर रखें और व्रत के दिन बासी (ठंडा) भोजन खाएँ। चूल्हा न जलाएँ। शीतला माता की पूजा करें और कथा सुनें।
महत्व
शीतला माता का व्रत रोगों से रक्षा और शीतलता प्रदान करने के लिए रखा जाता है। माता चेचक और अन्य संक्रामक रोगों से बचाती हैं।